पतितपावनी सरयू नदी का पौराणिक महत्त्व – ABOUT SARYU RIVER

SARYU RIVER KI MAHIMA

जहां तक श्री अयोध्या धाम स्थित है वहां तक सरयू नदी को महर्षियों ने ब्रम्हा स्वरूपनी सरयू की संज्ञा दिया है । चूँकि भगवान् राम के कुल गुरु श्री बशिष्ट जी महाराज मानसर से पैदल चलकर आगे आगे बशिष्ट जी चल रहे थे उनके पीछे सरयू मैया आयीं गुरुदेव के लेन के कारण सरयू का एक नाम बशिष्टा भी है । अयोध्या में स्थित सरयू जी में स्नान करने से कलिकाल के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं अब क्यूं अयोध्या में ही सरयू स्नान से पाप नष्ट हो जाते हैं इसका उत्तर है । अयोध्या अपने आप में पूर्ण ब्रम्ह है और सगुण रूप श्री सरयू जी हैं । यह मृत्यु लोक में नही है अयोध्या भगवान् विष्णु के चक्र पे बसी है ।

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अयोध्या च पूर्ण ब्रम्ह सरयू सगुणन पुमान तन्नि बासी जगन्नाथम सत्यं सत्यं बदम्यहम

अयोध्या में रहने वाले भगवान् विष्णु के तुल्य हैं । चुकी अयोध्या ब्रम्ह स्वरुप होने के कारण इनको ब्रम्ह स्वरूपिणी कहा गया । सरयू का तात्पर्य स से सीता रा से राम जू इसलिए सीता राम जू द्रव रूप में होके भक्त के भावों से इस जल को सीता राम जू का सगुण रूप माना गया है । जैसा की कहा गया है सरयू सगुणन पुमान

इसलिए धर्मावलम्बी सरयू जल से कुल्ला नही करते. सरयू जल से कुल्ला करने वालों की गति नही होती । भगवान् श्री राम जी का श्री मुख बचन है ।

जन्मभूमि मम पूरी सुहावनि, उत्तर दिशि सरयू बह पावनि

यह शब्द भी स्पस्ट करता है की सरयू माता का महात्म्य अयोध्या में सही स्थित सरयू से सम्बन्ध रखता है । आगे भगवान् राम फर कहते हैं कि यहाँ स्नान करने वालों का

जा मज्जन ते विनाहि प्रयाशा मम समीप नर पावहि वासा

श्री अयोध्या में स्थित सरयू मैया में स्नान करने से भगवान् श्री राम के समीप रहने का अधिकारी हो जाता है । इसीलिए श्री गोस्वामी तुलसी दास जी श्री अयोध्या और सरयू मैया का अलग अलग बर्णन नही किये । एक ही चौपाई में अयोध्या और सरयू के महात्म्य का वर्णन किया जैसा की मानस में मिलता है ।

बंदउ अवध पूरी अति पावनि, सरयू सरिकलि कलुष नसावहि

तात्पर्य कि अयोध्या में ही स्थित सरयू कलिकाल के पाप को नष्ट करने वाली हैं । इनके महात्म्य के विषय में अन्यान्य ग्रंथों में जो मिलता है उस महात्म्य को बताने की प्रयास कर रहा हूँ ।

मन्वन्तर सहस्त्रेस्तु काशी वासेशु जद फलं तत फलं समवाप्नोति सरयू दर्शने कृते

चारो युग जब 71 बार बीत जाता है तब एक मन्वंतर होता है इस प्रकार एक हजार मन्वंतर काशी में वास कीजिये गंगा में स्नान करके विश्वनाथ में जल चढाते हुए 1000 मन्वंतर में जो फल आपको प्राप्त होगा वह अयोध्या में सरयू मैया के दर्शन मात्र से प्राप्त हो जाता है ।

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मथुरायाम कल्प मेकं बसते मानवो यदि तत फलं समवाप्नोति सरयू दर्शने कृते

मथुरा में 1 कल्प यानी 4 अरब बत्तीस करोड़ मनुष्य के दिन से जब बीत जाता है तब एक कल्प होता है । 1 कल्प मथुरा में वास करने से जो फल प्राप्त होता है वह फल अयोध्या में सरयू मैया के दर्शन मात्र से प्राप्त हो जाता है । यह है अयोध्या में सरयू मैया का महात्म्य

तुलसी दास जी ने भी लिखा है ।

कोटि कल्प काशी बसे मथुरा कल्प हजार एक निमिष सरयू बसे तुले न तुलसी दास

तुलसीदास जी को उपरोक्त प्रमाण कम लगा इसलिए इन्होने अपने ग्रन्थ में सरयू महात्म्य को और भी विस्तृत रूप से बर्णन किया । यह है सरयू की महिमा

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